बीजात्मक तंत्र- चित्रा तारा आत्मस्थ प्रयोग(BEEJATAMAK TANTRA- CHITRAA TARA AATMSATH PRAYOG)
सम्पूर्ण कालशक्ति प्रतीक है गति की,गति जिसमे अभ्युदय है,विस्तार है और विनाश भी| इसे समझना इतना सहज नहीं है,कारण मात्र इतना है की,बिना किसी सही मार्गदर्शन के ये काल अर्थात अन्धकार हमें खुद में समेत लेता है और तब यदि हमारी ज्ञान इन्द्रियाँ चैतन्य नहीं रही तो अभ्युदय या उद्भव की खोज में सबसे पहले हमारा सामना संहार पक्ष से हो जाता है और ऐसे में हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है.
अभी थोड़े दिन पहले ही हम सब कई गुरु भाई-बहन पवन पावन कामाख्या धाम की ज्ञान यात्रा पर गए थे, और उस यात्रा में हमने तंत्र के विभिन्न पक्षों को समझा था,ऐसे ही एक दिन सुबह सुबह मुझे आरिफ जी के साथ (जिन्हें मैं आदर से मास्टर कहती हूँ) महोग्रातारा पीठ पर जाने का मौका मिला था,उन्होंने मुझे बताया था की पूर्ण चैतन्य ५ तारा पीठों में से मात्र यही महा उग्र तारा का पीठ है और सदगुरुदेव के निर्देशन में मुझे यहाँ बहुत वर्षों तक साधना कर माँ के विभिन्न रूपों को जानने का अवसर प्राप्त हुआ है,और प्राप्त हुए हैं कुछ खट्टे मीठे फल भी | माँ की विराटता का विस्तार यहाँ से होता हुआ समग्र सृष्टि को पल्लवित और पुष्पित करता है,महाविद्या का अर्थ होता है –अति उच्च ज्ञान जिसे मात्र आत्मानुभूति के द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है ,जिसकी प्राप्ति आत्मा के प्रकाश के द्वारा ही की जाती है,और याद रखने योग्य तथ्य ये है की यदि आपकी आत्मा का प्रकाश जरा सा भी मलिन रहा तो ऐसी अवस्था में भ्रम वश आप भटक भी सकते हैं और आपको उस पराज्ञान की प्राप्ति कदापि नहीं होगी. यदि आपको महाविद्या को समझना है तो आपको उसके वर्ण रहस्य को भी समझना होगा |जहाँ महाकाली कृष्ण रूप में दर्शित हैं वही भगवती तारा उज्जवल हैं और भगवती श्री विद्या रक्त वर्णीय है,अर्थात त्रिगुणात्मक रहस्यों अर्थात तम,रज और सत् को समझने के लिए ही क्रम से भगवती काली,तारा और त्रिपुर सुंदरी को रखा गया है.इस ज्ञान को दर्शन से नहीं समझा जा सकता है अपितु एकमात्र साधना के द्वारा ही इन्हें आत्मसात किया जा सकता है और इनके रहस्यों को जाना जा सकता है.
भगवती तारा मिश्र मत के अंतर्गत आती हैं और ये सादि विद्या कहलाती है अर्थात “स” वर्ण के अंतर्गत आती हैं भगवती तारा प्रतीक हैं शब्दशक्ति की,अर्थात साधक को यदि वाक् सिद्धि की प्राप्ति करनी हो या आगम तंत्र के मर्म को आत्मसात करना हो तो इनकी साधना से ही उस रहस्य कक्ष में प्रवेश किया जा सकता है.भगवती तारा के हिंदू सिद्धांत में ६ प्रकार उद्धृत है,और ये सभी ६ प्रकार की शब्दशक्ति प्रदान करते हैं.
याद रखिये की प्रकृति का प्रत्येक तत्व फिर वो चाहे सजीव हो या निर्जीव,चेतन हो अचेतन, एक विशेष प्रकार के स्पंदन से युक्त है, और इन स्पंदनों का स्त्रोत उस तत्व विशेष में व्याप्त ध्वनि होती हैं |और गूढता इसमें निहित है की यदि मनुष्य किसी ऐसी प्रक्रिया या पद्धति को समझ ले जिससे उस शब्द जो की उस तत्व में निहित है और उस शब्द की ध्वनि को सुन ले तब उस तत्व के अस्तित्व रहस्य को सहज ही समझा जा सकता है क्यूंकि शब्द अक्षय होते हैं जिन्हें कभी भी किसी भी परिस्थिति में नष्ट नहीं किया जा सकता है,ये अनंत काल से ब्रह्माण्ड में गुंजरित हैं,हाँ ये कही महत मंद हैं,कही माध्यम और कही अति तीव्र,और इसकी गति प्रकाश से कही ज्यादा है अतः इन शब्दों का आश्रय लेकर उस तत्व,जीव की उत्पत्ति,विस्तार और विनाश तीनों अवस्था को समझा जा सकता है,अर्थात उसका भूत,वर्तमान और भविष्य तीनों भली भांति ज्ञात किया जा सकता है | महाविद्या साधना अपने आप में अत्यंत गूढता लिए हुए होती हैं,सपर्या विधान, सम्बंधित भैरव और गणपति प्रयोग,बीज सिद्धि के बाद ही मूल साधना करके पूर्ण सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, और महाविद्याओं में भगवती तारा साधना तो जीवन का वरदान और सौभाग्य है | ये दुर्भाग्य नाश, दरिद्रता निवारण के साथ साथ अपार ऐश्वर्य की प्राप्ति तो करवाती ही हैं,साथ ही साथ पूर्ण शब्द शक्ति पर भी आपका अधिकार करवा देती हैं ,तब ऐसे में काल ज्ञान भी अछूता नहीं रह पाता है,परा,पश्यन्ति और वैखरी तीनो ही वाणी की गूढता को समझने की और ये अनिवार्य साधना है |
तब उन्होंने बताया की यदि इसी तारा पीठ पर चित्रा तारा का एक विशेष क्रम एक विशेष प्रकार से मात्र १० मिनट भी कर लिया जाये तो कान उन ध्वनियों और तंत्रों के श्लोक को श्रवण करने लगते हैं जो भगवती महोग्रातारा और चित्रा तारा से सम्बंधित हैं |मैंने उस क्रिया को संपन्न किया और थोड़े समय में ही मंद मंद ध्वनि का गुंजरन तीव्र होता चला गया और जो गर्भ गृह शांत था अचानक वहाँ ध्वनियों का स्वर तीव्र होता चला गया, थोड़ी देर बाद मैंने आँख खोल कर मास्टर से पूछा की ये जो ध्वनि सुनाई दे रही थी इनमे एक मन्त्र बार बार गुंजरित हो रहा था,भला क्यों|
हाँ मुझे ज्ञात है,यही प्रश्न जब मैंने सदगुरुदेव से पूछा था तो उन्होंने बताया था की वो मंत्र भगवती चित्रा तारा का है,और सभी प्रकार की तारा साधनाओं में ये मंत्र एक विशेषता लिए हुए है. प्रत्येक महाविद्या के प्रकट और गुप्त रूपों में से एक रूप ऐसा भी होता है जो की वास्तव में उस महाविद्या को साधक से आत्म एकाकार करा देता है, और ये तथ्य सभी महाविद्याओं के लिए प्रयुक्त होते हैं,भगवती तारा चित्रा रूप में प्रत्येक पदार्थ में ध्वनिशक्ति के रूप में विद्यमान रहती हैं,और भगवती चित्रा तारा का मंत्र वास्तव में भगवती तारा के ब्रह्मांडीय रूप से साधक का सायुज्यीकरण करवाता है|अर्थात एक सेतु का निर्माण करता है| जिसके द्वारा साधक और साध्य का योग होता है,तब इष्ट और साधक में कोई भेद नहीं होता है अपितु दोनों एक हो जाते हैं|
हम सभी अपने अपने साधना कक्ष में महाविद्याओं के या महाशक्तियों के यंत्रों को स्थापित करते हैं और उनसे सम्बंधित साधना प्रारंभ कर देते हैं और कुछ समय बाद कहते हैं की कोई लाभ दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है,और कोई अनुभूति नहीं हो रही है,क्या क्रिया गलत थी ?
नहीं क्रिया गलत नहीं थी अपितु हमने गुरु से पूर्ण क्रिया की प्राप्ति ही नहीं की,तब ऐसे में सफलता कैसे मिलेगी,याद रखिये यन्त्र उस शक्ति का ज्यामितीय रूप होता है जिसमे वो शक्ति निवास करती है और वो भी निद्रित रूप में और जब तक उस शक्ति की चेतना का साधक की चेतना से योग नहीं होता है,तब तक सिद्धि तो दूर अनुभूतियाँ भी नहीं होती हैं,हाँ कभी कभी काल का प्रवाह इतना प्रभावकारी हो जाता है या प्रारब्ध इतना बलवान होता है की साधक को ये सब क्रिया करने की आवशयकता नहीं होती है.परन्तु अन्य अवस्थाओं में तो पूर्ण क्रिया आवश्यक होती ही है.
भगवती तारा की चेतना को स्वयं की चेतना से कैसे योग ककिया जा सकता है मात्र उसी गुप्त तथ्य को मैं यहाँ पर रख रही हूँ. याद रखिये इष्ट की चेतनाशक्ति को सरलता से साधक की चेतना के साथ योग करवाने में चेतना मंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है,अब चेतना मंत्र परन्तु कैसा? तो इसका उत्तर है वो चेतना मंत्र जो गुरु के प्राणों से उद्धृत हो और उनकी चेतना से साधक को चैतन्य करता हो. हमें “गुरु प्राणश्चेतना मंत्र” के रूप में ऐसा मंत्र प्राप्त है, जब भी आपको भगवती तारा की साधना करनी हो उसके पहले मात्र आपको इतना ही करना है की यदि मूल साधना २१ दिनों की है तो आप उसे २८ दिन की मान लीजिए और प्रारंभ के ७ दिनों में गुरु द्वारा उपदेशित साधनात्मक नियमों का पालन करते हुए यन्त्र को सामने रख कर प्रारंभ के सभी क्रम (जो की सभी अन्य साधनाओं में किये जाते हैं जैसे,गुरु पूजन,गणपति पूजन,धुप-दीप,नैवेद्य आदि ) संपन्न करने के बाद भगवती तारा के यन्त्र के सामने ५१ बार “गुरु प्राणश्चेतना मंत्र” का जप करे और जप काल में दाहिने हाथ में यन्त्र को मुट्ठी बांध कर ह्रदय से स्पर्श कराये रखे,इसके बाद “भगवती चित्रा तारा मन्त्र” जो की “भगवती तारा आत्म एकाकार मन्त्र” भी है का जप ३१ माला पारद माला से किया जाये,इस मंत्र के मध्य आपके बाये हाथ में भगवती तारा का यन्त्र होना चाहिए और आप उस हाथ की बंधी हुयी मुट्ठी को अपने ह्रदय के पास रखेंगे.
भगवती चित्रा तारा मंत्र-
“ऐं ह्रीं श्रीं”
“AING HREENG SHREEM”
जप के बाद पुनः दाहिने हाथ की मुट्ठी में यन्त्र रख कर ह्रदय के पास रखे और ५१ बार “गुरु प्राणश्चेतना मंत्र” का जप करे,ये क्रम ७ दिनों तक करना है और इसके बाद आप मूल साधना करके देखिये,प्रभाव आपके सामने होगा|

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