Tuesday, 18 November 2014

AAWAHAN

ॐ भोले.....तेरी जटा में गंगा समाई....,.....करो भलाई...हरे शिव शंकर पार्वती माई....” बहोत दूर से पहाड़ी के ऊपर से आवाज़ आ रही थीनिश्चित रूप से कोई शाबर मंत्र की क्रिया में संलग्न होगा ऐसा मेने अंदाज़ा लगायाखुरदुरे पत्थरो से पहाड़ पर चड़ने लायक एक छोटी सी पगडण्डी कुदरती रूप से बनी हुई थीउससे ही ऊपर ऊपर प्रगाढ़ जंगल में में आगे आगे बढ़ रहा थासूर्योदय का समय था.निर्जन स्थान में किस प्रकार पहोच गया था में ये एक बार भी सोचा नहीं मेनेआगे आगे ही एक छोटा सा शिव मंदिर दिखा मुझे जिसके पास में ही एक और खंडित हालत में मंदिर थागिच जंगल के बिच में जहां दूर दूर तक मानव का नामोनिशान नहीं वहाँ पर इस प्रकार का मंदिर देख कर मन में यह विचार आया की ज़रूर यहाँ पर कोई सिद्ध ने कभी इस मंदिर को स्थापित किया होगापहाड़ की छोटी तो अभी बहोत दूर थी लेकिन मंत्र की ध्वनि आना बंद हो गया थासायद यह ध्वनि इसी स्थान के आस पास से आ रही थीतभी न जाने कहाँ से वहाँ पर दो सन्यासी प्रकट हो गए.दोनों में ज्यादा अंतर कर पाना संभव नहीं थादोनों के परिधानकद काठीतथा सन्यासी बाने या पहेचान एक जेसे ही थेदोनों ने भगवा धोती पहन रखी थी तथा आपस में कोई वार्तालाप कर रहे थेवह स्फुट प्रस्फुट वार्तालाप में मुझे इतना ही समज में आया की वह हिमालय के किसी प्राचीन मठ से  यहाँ पर आये हुवे हैक्यों की उनमे से एक सन्यासी बार बार यह कह रहा था की हम यहाँ हिमालय से आये है तो निश्चित रूप से उनको मिल कर ही जायेंगे तथा जल्द से जल्द उन्हें मिल कर हमें वापस हिमालय मठ में पहोचाना हैइससे ज्यादा में कुछ समज नहीं पायावे इतना बोल कर मंदिर के पास में ही बने कोई खण्डहर जेसे छोटे से मंदिर में प्रवेश कर गएमें भी उनके पीछे पीछे चल पड़ामंदिर के अंदर किसी भी प्रकार की कोई मूर्ति नहीं था यह देख कर विस्मय हुआलेकिन कोई मानव आकृति बैठी हुई नज़र आ रही थीवह विपरीत दिशा में बैठे हुवे थे तथा कोई प्रक्रिया कर रहे थेचेहरा तो देख नहीं पाया लेकिन उनकी पीठ पर बिखरे हुवे सफ़ेद बाल बहोत ही लंबे थे.लेकिन दिशा उलटी होने के कारण उनका चेहरा नहीं दिख रहा थाउन्होंने अपने दुबले पतले शरीर को बैठे बैठे ही अब मेरी दिशा में घुमायातथा उनका तेज पुंज वाला चहेरा एक रहस्यमय स्मित के साथ मेरे सामने द्रष्टिगोचर हुआ.चेहरा देख कर विश्वास नहीं हुआ एक बारगीयह तो वही सिद्ध है जोहाँसायद ५ साल बीत गए थे उस घटना को लेकिन पहेचानाने में बिलकुल भी गलती नहीं हुई थी मुझसे.
 यह सिद्ध गिर क्षेत्र था सिद्धो की भूमियहाँ पर कई इसे गुप्त मठ है जिनके बारे में काफी कुछ सुना थाकुछ साल पहले ऐसे कई मठो की खोज करने के उद्देश्य से काफी जंगली क्षेत्र में विचरण किया लेकिन कभी कुछ भी मिला नहींबाद में पता चला की किसी भी सिद्ध क्षेत्र में प्रवेश से पहले कुछ प्रक्रियाओ को करना अनिवार्य रहेता हैक्यों की सिद्धो की साधना पीठ तथा उनके सिद्ध क्षेत्र तंत्र क्रियाओ से बद्ध होते हैजिससे कोई भी उस क्षेत्र में प्रवेश करे उससे पहले ही उसका मानस परावर्तित हो जाता है या उच्चाटित हो जाता है जिससे की वह विपरीत दिशा में वापस चला जाता है या फिर उस क्षेत्र में प्रवेश करने की इच्छा ही मानसिक रूप से समाप्त हो जाती हैखैरउस समय इन प्रक्रियाओ का ज्ञान नहीं था, लेकिन प्रवेश से पहले तथा खोज के समय भी में अज्ञात सिद्धो को प्रार्थना करता रहता था की वे मुझे दर्शन दे तथा सिद्ध पीठ मेरे सामने आयेऔर इसी प्रार्थना के साथ न ही दिशा निर्धारित कर के न ही कोई आधारतथ्य को ध्यान में ले कर बस किसी भी दिशा में चलता रहता जहां पर जंगली जानवरों का खतरा जितना भी हो सके अल्प हो और प्रार्थना करता रहतालेकिन कई दिनों तक भी ऐसा संभव नहीं हुआ तब हतास हो कर एक दिन क्षमा याचना कर अपनी खोज समाप्त करने का निश्चय कियाउसी दिन रात्री काल में अचानक से तन्द्रा अवस्था को प्राप्त हुआ शरीर तथा बेहोशी छाने लगीआँखों के सामने एक सफ़ेद वस्त्र धारी महात्मा प्रस्तुत हुवेउनके बाल तथा दाढ़ी अत्यधिक लंबे थे, चेहरा पूर्ण गौर वर्ण का थाआयु का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता थानिश्चित ही वे कोई बहोत बड़े सिद्ध थे

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