सिद्धयोगी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा की जेसा की में कह चूका हू उनके मूल शरीर में वापस आते ही उनमे पूर्व बोध और संस्कार कुछ अंश में वापस आ जाते है, ये जिव की भोग प्रवृति ज्यादा होती है अतः ये किसी भी जिव को अपने भोग से सबंधित इछाओ और तृष्णाओ के लिए वचनबद्ध कर लेती है, इसके बाद उनसे कई प्रकार के उपभोग ये प्राप्त कर लेती है. क्यों की ये योनिया भी अपनी सिद्धियो का इस्तेमाल मूल रूप से व्यक्ति की विरोधइच्छा पर नहीं कर सकती है इस लिए ज़रुरी यह होता है की वह सामने वाले व्यक्ति को किसी न किसी रूप में ऋणी बना कर बाध्य कर ले. इसी लिए कई बार ये जिव सामने वाले जिव से वचन ले ले लेते है, वचनबद्ध हो जाने पर जिव के लिए कार्मिक नियमों के अनुसार यह आवश्यक हो जाता है की वह वचन का पालन करे और अगर व्यक्ति अपने वचन का पालन नहीं करता है तो यह जिव अपनी शक्ति का इस्तेमाल तब कर सकता है क्यों की व्यक्ति कर्मो के सिद्धांत के अनुसार बध्ध है. एसी स्थिति में वह श्राप देने से भी नहीं चुकते. अगर तुम उस समय वचनबद्ध हो गए होते तो तुम्हारे लिए यह ज़रुरी था की वह जो भी इच्छा प्रकट करे उसकी पूर्ती करो. इनकी इच्छा भोगजन्य होती है लेकिन तंत्र साधको की इच्छाओ के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता, ऐसा भी हो सकता था की वह तुम्हारे पास से कोई साधना मांग ले या ऐसा भी की तुम्हारे पास से वह तुम्हारी साधनात्मक उर्जा को मांग ले जो सिंचित की गई है, एसी स्थिति में वह सारी उर्जा को साधक से खिंच कर अपने पास लेने से नहीं कतराते और असीम सिद्धियो के स्वामी बन जाते है हालाकि इसका परिणाम भयंकर ही होता है लेकिन सिद्धि के मद और लालच में एसी भयंकर भूल होती है, साथ ही साथ अगर तुम ऐसा नहीं करते तो तुम श्राप के हकदार होते इसी लिए तुम्हारा अनुभव उसी समय समाप्त कर दिया गया था. साधको को हमेशा वचन देने में ध्यान रखना चाहिए, सत्य का उच्चारण और उसी के अनुरूप साधक का आचरण हो ये ज़रुरी है, साधक अपने ह्रदय में जितना भी मेल और मलेछ रहता है, उतना ही उसकी श्रापबध्ध होने की संभावना बढ़ जाती है और एसी स्थिति में साधक के ऊपर विभ्भिन्न प्रकार की इतरयोनी हावी रहती है और अनिष्ट की संभावना बढती है. ये साधक के साधनात्मक जीवन की बात है इसे भौतिकता से नहीं जोड़ा जाता. मेने कहा की एक साधक को इसके अलावा कोन कोन सी एसी बात है जिसका ख्याल रखना चाहिए इतरलोक के सबंध में. सिद्ध ने मेरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा की जेसे की तुम्हे कहा जा चूका है, देव योनी साधक के आतंरिक स्तर मात्र को देख कर उसकी तरफ आकर्षित होती है, साधक का चित जितना विशुद्ध होगा साधक के लिए देव योनी से संपर्क स्थापित करने में उतना ही सफल हो पाएगा. इसके लिए साधक एक तांत्रिक मंत्र है जो की महासिद्ध गोरखनाथ प्रणित है, इस मंत्र का जाप अगर व्यक्ति रात्री काल १० बजे के बाद में या ब्रम्ह मुहूर्त में एक माला नित्य करे तो उसमे इस प्रकार का परिवर्तन आने लगता है,यह मंत्र में दिशा उत्तर रहे तथा साधक के वस्त्र और आसान कोई भी रहे, साधक कोई भी माला से इसका जाप कर सकता है, “ॐ नमो नारायणाय सिद्ध गुरु को आदेश आदेश आदेश ”. इस में दिन की संख्या नहीं है, साधक को इसे करते रहना चाहिए और अगर साधक इसे नियमित नहीं रख सके तो भी कोई दोष नहीं लगता, इस प्रकार योगतंत्र जगत में नए साधको के लिए यह मन्त्र वरदान का काम करता है. इसके अलावा एक तंत्र साधक को अपने मन में चल रहे विचारों पर हमेशा ये ध्यान रखना चाहिए की उसका यह विचार उसका क्या नूतन ज्ञान दे सकता है, इस प्रकार साधक का चिंतन सदैव ही साधनामय बना रहता है और जितना ही साधक का चिंतन साधनामय बना रहेगा साधक को साधना की प्रक्रिया के लिए भी उतनी ही मजबूत पृष्ठभूमि प्राप्त होगी. कई साधक साधना नहीं कर पाते है लेकिन उनका चिंतन बराबर साधनात्मक ही रहता है, एसी स्थिति में अगर वो शुद्ध भाव से और ज्ञान तत्व तथा गुरु तत्व के प्राप्ति के लिए साधनात्मक चिंतन भी करता है तो स्वः लोक के सिद्ध उसको साधना की प्रक्रिया की और गतिशील करने के लिए तैयार करते है, साधक को लगेगा की स्वतः ही एसी परिस्थितियो का निर्माण हो गया है की उसको साधना की प्रक्रिया करने के लिए एक सुविधापूर्ण माहोल मिल गया है लेकिन इसके मूल में दिव्यसिद्ध होते है इस लिए जो मन से साधना करना चाहता हो उसे एक समय पे मौका मिल ही जाता है किसी न किसी रूप में. अतः निराश होने का कोई कारण नहीं है, वैसे भी अगर साधक सही में साधक ही है तो उसके मूल तत्व की खोज के लिए उसका अंतर्मन उसे हमेशा आकर्षित करता ही रहेगा. मेने पूछा की साधको के मन में यह जिज्ञासा बराबर रहती है की उसे साधना के क्षेत्र की और अग्रसर होना चाहिए जिससे उसे त्वरित सफलता मिले. महासिद्ध ने इस प्रश्न का जो उत्तर दिया उसे सुन कर मन को एक नूतन ही बोध मिला.
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