Tuesday, 18 November 2014

Aawahan


मेने पूछा कौनसा लोकउत्तर में उस देव कन्या ने मुझे जो बताया वह योग तंत्र जगत का एस गुप्त पृष्ठ था. उसने मेरे प्रश्न का जवाब देते हुए कहावैश्वानरलोक”. नाम सुनते ही एक बार अतीत के गर्भ में चला गयासदगुरुदेव ने जब कुण्डलिनी तथा चक्रों के बारे में बताया था तब उन्होंने इस लोक का जिक्र किया था कुण्डलिनी चक्रलोक स्थान में जो तीसरा लोक है वह यही लोक है. निश्चय ही कुण्डलिनी एक अत्यधिक गुढ़ विषय है जिसे समजना बहोत ही कठिन हैइस लोक को आत्म शक्ति लोक भी कहा जाता है. यह एक शुभ्र लोक है जहा पर उच्चकोटि के योगी अपने देहत्याग परंत निवास करते है अपने सूक्ष्म या दिव्य शरीर के माध्यम सेवैसे भी कई तंत्रग्रंथो में इस लोक का ज़िक्र यदा कद मिल ही जाता है. कुण्डलिनी के सप्त चक्रों का सबंध सात लोक से हैवे सप्त लोक है भू, भुवःस्वः, मःतपःजन और सत्यं. ये तीसरा लोक अर्थात स्वः लोक है. जिसका सबंध मणिपुर चक्र से है. शरीर में समस्त प्राणों का संचार और नियंत्रण मणिपुर चक्र से होता है. योगी जब इस चक्र को पूर्ण रूप से उसके वर्णों के साथ साध कर उसका भेदन कुण्डलिनी से कर चक्र को पूर्ण विक्सित कर देता है तब वह सिद्ध योगी का सबंध इस लोक से हो जाता है. वस्तुतः यह लोक में योगी अपनी जरूरियात के मुताबिक़ खुद ही आवश्यक चीजों का सर्जन कर लेता है. फिर वह चाहे अपनी साधना स्थली हो या पैड पौधे या ज़मीन. इस प्रकार उनकी गतिशीलता किसी भी रूप से बाधक नहीं होती. हेमऋताने अपनी बात आगे बढ़ाई वह लोक में महासिद्धो में ज्यादातर सिद्ध वे होते है जिन्होंने समाधी ले ली हो और वह फिर जन्म लेने के लिए बाध्य नहीं हो. एसी दिव्यआत्माये साधको की सदैव मदद करती हैसाधक के साधनात्मक अनुभव में कई बार इन सिद्धो की कृपा ही होती हैअगर कोई साधक बार बार कोशिश करता है और कोई सामान्य चूक से उसे सफलता नहीं मिल रही होती है तब उनको प्रोत्साहन के लिए कई प्रकार के अनुभव साधको को कराये जाते है इन्ही सिद्धो के द्वारा जिससे की साधक की मन:शक्ति बनी रहे या विक्सित हो. तुम्हारा यहाँ पर आगमन का भी यही रहस्य है. मेरे सामने से रहस्य का पर्दा उठ गया था. मेने कहा की तुम कौन होये सब केसे जानती होउस देवकन्या का चेहरा अचानक गंभीर हो गयाउसने कहा की में तुम्हे में तुम्हे इसके बारे में बता सकती हू लेकिन तुम्हे एक वचन देना होगा. मेने उससे पूछा की क्याउसने जवाब दिया की पहले वचन दो की में जेसा कहती हू वेसा करोगे. एक क्षण लगा मुझे ये सोचने में की इसे वचन दू या नहीं लेकिन इससे पहले की मेरे मुख से हाँ शब्द का उच्चारण होमुझे जोर से खिंचाव महसूस हुआ और मूल शरीर से जुड गया मेरा सूक्ष्म शरीर. वापस पृथ्वी लोक पर था में. समजते देर नहीं लगी मुझे की स्वः लोक के सिद्धात्मा जिन्होंने मुझे यह अनुभव कराया था उनकी ही यह मर्ज़ी थी की मेरा अनुभव यही पर समाप्त हो जाए. निश्चय ही स्वःलोक की प्राप्ति अपने आप में एक दुर्लभ सिद्धि है. आगे तंत्र के अभ्यास में मुझे पता चला की आवाहन की कई प्रक्रियाए है जिनसे इन सिद्ध आत्माओ का आवाहन किया जा सकता है या उनसे संपर्क स्थापित किया जा सकता हैकई महासिद्धो इस लोक में सशरीर विचरण करते है ऐसे दिव्य सिद्धो के संपर्क में आना अपने आप में सौभाग्य ही है. लेकिन इनसे संपर्क स्थापित करने के लिए आवाहन का सहारा नहीं लिया जाता क्यों की मंत्र के आधीन हो कर किसी सिद्ध को बुलाना योग्य नहीं कहा जा सकताउनका एक एक क्षण अमूल्य होता है तथा कई बार तंत्र के प्रकांड साधक को उनकी मर्ज़ी के खिलाफ आवाहित करने पर क्रोधित भी हो सकते हैइस लिए ऐसे सिद्धो से संपर्क बहोत ही मुश्किल है. योग तंत्र में एक एसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति ऐसे सिद्धो से मानसिक रूप से संपर्क स्थापित कर सकते है. साधक को इस साधना का अभ्यास ब्रम्हमुहूर्त या रात्री काल में ११:३० के बाद करे. साधक स्नान करे और उसके बाद अपने आसान पर बैठ कर श्रीं बीज के साथ अनुलोम विलोम कर शरीर की चेतना को मणिपुर चक्र पर केंद्रित करे अर्थात मणिपुर चक्र पर आतंरिक रूप से ध्यान लगाए इसके बाद साधक मन ही मन ह्रों ह्रीं ह्रों महासिद्धाय नमः (hrom hreem hrom mahasiddhay namah)का जाप करे. ऐसा एक घंटे करने पर धीरे धीरे साधक को ये सामर्थ्य आ जाती है जिसके माध्यम से वह सिद्धो से संपर्क करने में सफल हो जाता हैऐसा संपर्क स्वप्नावस्था या भावअवस्था में होता है. तब साधक उनसे साधनात्मक ज्ञान को प्राप्त कर सकता है. यह सहज नहीं है लेकिन नित्य अभ्यास से निश्चित रूप से ऐसा संभव हो जाता है. इसके प्रक्रिया के अलावा तंत्र मार्ग में एक गुप्त तथा अद्भुत साधना है जिसे सम्प्रेषण साधना या सिद्ध सम्प्रेषण साधना कहते हैइस साधना के माध्यम से व्यक्ति कुछ ही दिनों में ऐसे ही स्वः तथा अन्य लोक के महासिद्धो से विचारों का आदान प्रदान संभव हो जाता है और तब वह अपनी खुशी से साधक को योग्य मार्गदर्शन देते है. खेर हेमऋता का अनुभव अपने आप में कई प्रशो के उत्तर देता गया और पीछे छोड़ गया कई और नए प्रश्न . ये रहस्य का अनावरण क्यों नहीं हुआ? क्या बताना था उसेक्या वचन चाहिए था उसे. किसने ये अनुभव करायामुझे ही क्यों? क्या उन्हें भी कोई निर्देश देता हैइतने समय तक ही क्योंगन्धर्वलोक ही क्यों? और क्यों हेमऋता से मुलाकातकुछ समज नहीं पाया. सेंकडो सवाल आ गए दिमाग में. लेकिन मेरे कमरे में में अकेला थाकोई नहीं था जो मुझे जवाब दे सके इस बात का.
मेरे सवालो का जवाब अब मुझे खुद ही प्राप्त करने थे और इस लिए अब मेरे पास आवाहन का ही सहारा थात्रिनेत्र त्राटक और सूक्ष्म जगत की प्रक्रिया के माध्यम से फिर से एक बार संपर्क किया सूक्ष्म जगत में निवास करने वाली दिव्य आत्माओ को. परिचय में आया एक दिव्यात्मा केमन को तसल्ली हुई की ज़रूर इनके पास मेरे सवालो का जवाब होगा. फिर रोक नहीं पाया में अपने आपको एक क्षण भीबोलने के लिए तो कुछ था ही नहींहमेशा की तरह महात्मा सब कुछ जानते थे. मेने पूछा की आखिर क्या कहना चाहती थी मुझे वो? थोडा मुस्कुराए मेरे इस अबोध सवाल पर महात्माफिर बोले की तुम्हे सायद ज्ञात नहीं की साधना और तपस्या की ललक पृथ्वी लोक के मनुष्यों के अलावा दूसरे लोक के कई जीवो में भी होती हैयक्षकिन्नर आदि लोक लोकान्तरो का तो साधना के प्रति बराबर आकर्षण रहा ही है लेकिन भोग प्रवृति के कारण ये जिव साधना सम्प्पन नहीं कर पाते, इनमे विलास प्रवृति ज्यादा होती है इस लिए साधना सम्प्पन करना सभी के बस की बात नहीं है. उच्चतम भोग प्राप्त करने के लिए मनुष्य को साधना करनी पड़ती है जो की इनके लिए सहज सुलभ है लेकिन इनकी यही भोग प्रवृति की लोलुपता इनको बाध्य करती है भोग से आगे जा कर मोक्ष की प्राप्ति में. फिर भी कुछ ऐसे जिव होते है जिनका आकर्षण भोग से ऊपर उठने की और भी होता हैइसी लिए समय समय पर कुछ ऐसे जिव पृथ्वी लोक में जन्म लेते है मनुष्य बन कर और उनके अंतर्मन में दबी हुई चेतना उनको साधना के मार्ग पर गतिशील करती है. जब वह इस योनी से मुक्त होते है मृत्यु पर्यंत तब उन्हें अपने मूल रूप का बोध होता है. इस प्रकार पृथ्वी पर कई ऐसे मनुष्य होते है जो साधना मार्ग पर होते है लेकिन उनको ये ज्ञात नहीं होता है की वह किसी अन्य लोक से हैक्यों की मानव योनी में जब गर्भ में प्राण का संचार होता है तब उसकी चेतना पूर्ण रूप से जागृत होती है लेकिन गर्भ के बहार आते ही उनकी ये चेतना का लोप हो जाता हैइसके मूल में जो तत्व है वह है असुरक्षा या भय. स्मृति का भय से बहोत ही लेना देना है, भय स्मृति को बढ़ा या घटा सकता हैभयभीत मनुष्य कई बार संज्ञा शून्य भी हो जाता है तो कई बार उसे कई सालो पुरानी बाते याद आ जाती हैमनुष्य योनी की यह प्रक्रिया अंतरमन के द्वारा प्रेरित होती हैइस लिए गर्भ में उसे सुरक्षा का आभास होता है, जन्म के समय शरीर में असुरक्षा का बोध जिव में भय का संचार करता है जिससे की अंतरमन उसकी पूर्व स्मृति शक्ति का निषेध कर देती है. लेकिन प्राणतत्वमन तत्व और आत्म तत्व जब इस योनी से मुक्त होते है तब वापस सुरक्षा बोध के माध्यम से चेताशक्ति को जागृत कर स्मृति शक्ति को मूल रूप से कार्यरत कर देती है इस लिए व्यक्ति को अपने जीवन के सभी बोध होने लगते हैतुम जिससे मिले थे वह भी कभी इसी प्रकार पृथ्वी पर मनुष्य योनी से साधना कर चुकी है. लेकिन उसने तुम्हे वचन मांगा था इस लिए तुम्हारा अनुभव वही पर समाप्त कर दिया गया थास्वभावतः धारण किये हुए शरीर का आत्म तत्व पर बोध का संचार करता है इस लिए धारण किये हुए शरीर के मुताबिक़ व्यक्ति के लक्षण और स्वभाव भी इसी प्रकार का हो जाता हैइसी लिए योगी उच्चकुल तथा साधनातम वातावरण वाले गर्भ में जन्म लेना ज्यादा पसंद करते है जिससे की उनको आत्मतत्व की अशुद्धियो को दूर करने में ज्यादा समय ना लगे. या फिर जब परकाया प्रवेश किया जाता है तब भी किसी मृतयोगी का या विशेष बोध वाले शरीर का चयन उच्चयोगी करते है. साधना में पूर्ण बोध ना होने पर जब बाहरी जिव अपनी मूल योनी में वापस आते है तो स्वभाव से ही उनमे उनके पूर्व गुण कुछ अंश के रूप में ही सही लेकिन वापस आ जाते है,भोगजन्य देव योनी के जिव भी इससे छूट नहीं सकते इस लिए उनमे भी भोग की वृति वापस आ ही जाती है वस्तुतः इसका शुद्धिकरण ज़रुरी है वर्ना एक बार ये संस्कार हावी हो जाए तो फिर से नए रूप में साधना करनी पड़ती हैइस लिए गुरु की महत्ता निर्विवादित रूप से स्वीकार की जाती हैगुरु अपने शिष्य को इन चक्करों से बचा कर उसका मूल लक्ष्य बार बार उसके सामने रखते हैऐसा कई जन्मो तक होता रहता हैजब तक की वह पूर्ण बोध को प्राप्त ना कर ले जिसके बाद वह शरीर के बोध को या लक्षण को अपने ऊपर हावी ना होने दे. इसी लिए साधक बार बार जन्म ले कर अपना मार्जन करता रहता है और गुरु उसको इस कार्य में मार्ग दिखाते ही रहते है. भले ही साधक इन सब बातो से अनजान हो लेकिन उसके अंतरमन में ये तथ्य हमेशा विद्यमान रहता है और इसी के कारण जीवन में सब कुछ होते हुवे भी वह अपने मूल तत्व को तलाशता रहता है और एक दिन साधना मार्ग की और गतिशील हो ही जाता है. यह सारी प्रक्रिया सिद्धगुरु के मध्य से होती है और एक सिद्ध गुरु ही एसी प्रक्रिया कर सकता है. ये सब कार्य में स्वः लोक के सिद्ध सहायता करते है.
सिद्धयोगी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा की जेसा की में कह चूका हू उनके मूल शरीर में वापस आते ही उनमे पूर्व बोध और संस्कार कुछ अंश में वापस आ जाते हैये जिव की भोग प्रवृति ज्यादा होती है अतः ये किसी भी जिव को अपने भोग से सबंधित इछाओ और तृष्णाओ के लिए वचनबद्ध कर लेती हैइसके बाद उनसे कई प्रकार के उपभोग ये प्राप्त कर लेती है. क्यों की ये योनिया भी अपनी सिद्धियो का इस्तेमाल मूल रूप से व्यक्ति की विरोधइच्छा पर नहीं कर सकती है इस लिए ज़रुरी यह होता है की वह सामने वाले व्यक्ति को किसी न किसी रूप में ऋणी बना कर बाध्य कर ले. इसी लिए कई बार ये जिव सामने वाले जिव से वचन ले ले लेते हैवचनबद्ध हो जाने पर जिव के लिए कार्मिक नियमों के अनुसार यह आवश्यक हो जाता है की वह वचन का पालन करे और अगर व्यक्ति अपने वचन का पालन नहीं करता है तो यह जिव अपनी शक्ति का इस्तेमाल तब कर सकता है क्यों की व्यक्ति कर्मो के सिद्धांत के अनुसार बध्ध है. एसी स्थिति में वह श्राप देने से भी नहीं चुकते. अगर तुम उस समय वचनबद्ध हो गए होते तो तुम्हारे लिए यह ज़रुरी था की वह जो भी इच्छा प्रकट करे उसकी पूर्ती करो. इनकी इच्छा भोगजन्य होती है लेकिन तंत्र साधको की इच्छाओ के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकताऐसा भी हो सकता था की वह तुम्हारे पास से कोई साधना मांग ले या ऐसा भी की तुम्हारे पास से वह तुम्हारी साधनात्मक उर्जा को मांग ले जो सिंचित की गई हैएसी स्थिति में वह सारी उर्जा को साधक से खिंच कर अपने पास लेने से नहीं कतराते और असीम सिद्धियो के स्वामी बन जाते है हालाकि इसका परिणाम भयंकर ही होता है लेकिन सिद्धि के मद और लालच में एसी भयंकर भूल होती हैसाथ ही साथ अगर तुम ऐसा नहीं करते तो तुम श्राप के हकदार होते इसी लिए तुम्हारा अनुभव उसी समय समाप्त कर दिया गया था. साधको को हमेशा वचन देने में ध्यान रखना चाहिएसत्य का उच्चारण और उसी के अनुरूप साधक का आचरण हो ये ज़रुरी है, साधक अपने ह्रदय में जितना भी मेल और मलेछ रहता हैउतना ही उसकी श्रापबध्ध होने की संभावना बढ़ जाती है और एसी स्थिति में साधक के ऊपर विभ्भिन्न प्रकार की इतरयोनी हावी रहती है और अनिष्ट की संभावना बढती है. ये साधक के साधनात्मक जीवन की बात है इसे भौतिकता से नहीं जोड़ा जाता. मेने कहा की एक साधक को इसके अलावा कोन कोन सी एसी बात है जिसका ख्याल रखना चाहिए इतरलोक के सबंध में. सिद्ध ने मेरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा की जेसे की तुम्हे कहा जा चूका हैदेव योनी साधक के आतंरिक स्तर मात्र को देख कर उसकी तरफ आकर्षित होती हैसाधक का चित जितना विशुद्ध होगा साधक के लिए देव योनी से संपर्क स्थापित करने में उतना ही सफल हो पाएगा. इसके लिए साधक एक तांत्रिक मंत्र है जो की महासिद्ध गोरखनाथ प्रणित हैइस मंत्र का जाप अगर व्यक्ति रात्री काल १० बजे के बाद में या ब्रम्ह मुहूर्त में एक माला नित्य करे तो उसमे इस प्रकार का परिवर्तन आने लगता है,यह मंत्र में दिशा उत्तर रहे तथा साधक के वस्त्र और आसान कोई भी रहेसाधक कोई भी माला से इसका जाप कर सकता है, “ॐ नमो नारायणाय सिद्ध गुरु को आदेश आदेश आदेश ”.  इस में दिन की संख्या नहीं हैसाधक को इसे करते रहना चाहिए और अगर साधक इसे नियमित नहीं रख सके तो भी कोई दोष नहीं लगताइस प्रकार योगतंत्र जगत में नए साधको के लिए यह मन्त्र वरदान का काम करता है. इसके अलावा एक तंत्र साधक को अपने मन में चल रहे विचारों पर हमेशा ये ध्यान रखना चाहिए की उसका यह विचार उसका क्या नूतन ज्ञान दे सकता हैइस प्रकार साधक का चिंतन सदैव ही साधनामय बना रहता है और जितना ही साधक का चिंतन साधनामय बना रहेगा साधक को साधना की प्रक्रिया के लिए भी उतनी ही मजबूत पृष्ठभूमि प्राप्त होगी. कई साधक साधना नहीं कर पाते है लेकिन उनका चिंतन बराबर साधनात्मक ही रहता हैएसी स्थिति में अगर वो शुद्ध भाव से और ज्ञान तत्व तथा गुरु तत्व के प्राप्ति के लिए साधनात्मक चिंतन भी करता है तो स्वः लोक के सिद्ध उसको साधना की प्रक्रिया की और गतिशील करने के लिए तैयार करते हैसाधक को लगेगा की स्वतः ही एसी परिस्थितियो का निर्माण हो गया है की उसको साधना की प्रक्रिया करने के लिए एक सुविधापूर्ण माहोल मिल गया है लेकिन इसके मूल में दिव्यसिद्ध होते है इस लिए जो मन से साधना करना चाहता हो उसे एक समय पे मौका मिल ही जाता है किसी न किसी रूप में. अतः निराश होने का कोई कारण नहीं हैवैसे भी अगर साधक सही में साधक ही है तो उसके मूल तत्व की खोज के लिए उसका अंतर्मन उसे हमेशा आकर्षित करता ही रहेगा. मेने पूछा की साधको के मन में यह जिज्ञासा बराबर रहती है की उसे साधना के क्षेत्र की और अग्रसर होना चाहिए जिससे उसे त्वरित सफलता मिले. महासिद्ध ने इस प्रश्न का जो उत्तर दिया उसे सुन कर मन को एक नूतन ही बोध मिला.

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सिद्धयोगी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा की जेसा की में कह चूका हू उनके मूल शरीर में वापस आते ही उनमे पूर्व बोध और संस्कार कुछ अंश में वापस आ जाते हैये जिव की भोग प्रवृति ज्यादा होती है अतः ये किसी भी जिव को अपने भोग से सबंधित इछाओ और तृष्णाओ के लिए वचनबद्ध कर लेती हैइसके बाद उनसे कई प्रकार के उपभोग ये प्राप्त कर लेती है. क्यों की ये योनिया भी अपनी सिद्धियो का इस्तेमाल मूल रूप से व्यक्ति की विरोधइच्छा पर नहीं कर सकती है इस लिए ज़रुरी यह होता है की वह सामने वाले व्यक्ति को किसी न किसी रूप में ऋणी बना कर बाध्य कर ले. इसी लिए कई बार ये जिव सामने वाले जिव से वचन ले ले लेते हैवचनबद्ध हो जाने पर जिव के लिए कार्मिक नियमों के अनुसार यह आवश्यक हो जाता है की वह वचन का पालन करे और अगर व्यक्ति अपने वचन का पालन नहीं करता है तो यह जिव अपनी शक्ति का इस्तेमाल तब कर सकता है क्यों की व्यक्ति कर्मो के सिद्धांत के अनुसार बध्ध है. एसी स्थिति में वह श्राप देने से भी नहीं चुकते. अगर तुम उस समय वचनबद्ध हो गए होते तो तुम्हारे लिए यह ज़रुरी था की वह जो भी इच्छा प्रकट करे उसकी पूर्ती करो. इनकी इच्छा भोगजन्य होती है लेकिन तंत्र साधको की इच्छाओ के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकताऐसा भी हो सकता था की वह तुम्हारे पास से कोई साधना मांग ले या ऐसा भी की तुम्हारे पास से वह तुम्हारी साधनात्मक उर्जा को मांग ले जो सिंचित की गई हैएसी स्थिति में वह सारी उर्जा को साधक से खिंच कर अपने पास लेने से नहीं कतराते और असीम सिद्धियो के स्वामी बन जाते है हालाकि इसका परिणाम भयंकर ही होता है लेकिन सिद्धि के मद और लालच में एसी भयंकर भूल होती हैसाथ ही साथ अगर तुम ऐसा नहीं करते तो तुम श्राप के हकदार होते इसी लिए तुम्हारा अनुभव उसी समय समाप्त कर दिया गया था. साधको को हमेशा वचन देने में ध्यान रखना चाहिएसत्य का उच्चारण और उसी के अनुरूप साधक का आचरण हो ये ज़रुरी है, साधक अपने ह्रदय में जितना भी मेल और मलेछ रहता हैउतना ही उसकी श्रापबध्ध होने की संभावना बढ़ जाती है और एसी स्थिति में साधक के ऊपर विभ्भिन्न प्रकार की इतरयोनी हावी रहती है और अनिष्ट की संभावना बढती है. ये साधक के साधनात्मक जीवन की बात है इसे भौतिकता से नहीं जोड़ा जाता. मेने कहा की एक साधक को इसके अलावा कोन कोन सी एसी बात है जिसका ख्याल रखना चाहिए इतरलोक के सबंध में. सिद्ध ने मेरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा की जेसे की तुम्हे कहा जा चूका हैदेव योनी साधक के आतंरिक स्तर मात्र को देख कर उसकी तरफ आकर्षित होती हैसाधक का चित जितना विशुद्ध होगा साधक के लिए देव योनी से संपर्क स्थापित करने में उतना ही सफल हो पाएगा. इसके लिए साधक एक तांत्रिक मंत्र है जो की महासिद्ध गोरखनाथ प्रणित हैइस मंत्र का जाप अगर व्यक्ति रात्री काल १० बजे के बाद में या ब्रम्ह मुहूर्त में एक माला नित्य करे तो उसमे इस प्रकार का परिवर्तन आने लगता है,यह मंत्र में दिशा उत्तर रहे तथा साधक के वस्त्र और आसान कोई भी रहेसाधक कोई भी माला से इसका जाप कर सकता है, “ॐ नमो नारायणाय सिद्ध गुरु को आदेश आदेश आदेश ”.  इस में दिन की संख्या नहीं हैसाधक को इसे करते रहना चाहिए और अगर साधक इसे नियमित नहीं रख सके तो भी कोई दोष नहीं लगताइस प्रकार योगतंत्र जगत में नए साधको के लिए यह मन्त्र वरदान का काम करता है. इसके अलावा एक तंत्र साधक को अपने मन में चल रहे विचारों पर हमेशा ये ध्यान रखना चाहिए की उसका यह विचार उसका क्या नूतन ज्ञान दे सकता हैइस प्रकार साधक का चिंतन सदैव ही साधनामय बना रहता है और जितना ही साधक का चिंतन साधनामय बना रहेगा साधक को साधना की प्रक्रिया के लिए भी उतनी ही मजबूत पृष्ठभूमि प्राप्त होगी. कई साधक साधना नहीं कर पाते है लेकिन उनका चिंतन बराबर साधनात्मक ही रहता हैएसी स्थिति में अगर वो शुद्ध भाव से और ज्ञान तत्व तथा गुरु तत्व के प्राप्ति के लिए साधनात्मक चिंतन भी करता है तो स्वः लोक के सिद्ध उसको साधना की प्रक्रिया की और गतिशील करने के लिए तैयार करते हैसाधक को लगेगा की स्वतः ही एसी परिस्थितियो का निर्माण हो गया है की उसको साधना की प्रक्रिया करने के लिए एक सुविधापूर्ण माहोल मिल गया है लेकिन इसके मूल में दिव्यसिद्ध होते है इस लिए जो मन से साधना करना चाहता हो उसे एक समय पे मौका मिल ही जाता है किसी न किसी रूप में. अतः निराश होने का कोई कारण नहीं हैवैसे भी अगर साधक सही में साधक ही है तो उसके मूल तत्व की खोज के लिए उसका अंतर्मन उसे हमेशा आकर्षित करता ही रहेगा. मेने पूछा की साधको के मन में यह जिज्ञासा बराबर रहती है की उसे साधना के क्षेत्र की और अग्रसर होना चाहिए जिससे उसे त्वरित सफलता मिले. महासिद्ध ने इस प्रश्न का जो उत्तर दिया उसे सुन कर मन को एक नूतन ही बोध मिला.

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दिव्यदेहधारी महासिद्ध ने मेरे प्रश्न के उत्तर में बताया की साधक के लिए सब से उपयुक्त क्षेत्र वही होता है जिसमे उसकी रुचि होसाधक खुद ही उस क्षेत्र की तरफ आकर्षित होने लगेगा जिस क्षेत्र की तरफ उसे बढ़ना चाहिए क्यों की जेसे की पहले ही कहा की साधक को चाहे अपने मूल के बारे में ज्ञान हो या ना हो उसके अंतरमन में जरुर सारी स्मृति होती ही है और यही अंतरमन साधक को रिक्तता के बारे में सूचित करता रहता है और अंत में वह साधना मार्ग पर आगे बढ़ ही जाता हैइस लिए यह सवाल नहीं है की साधक को किस क्षेत्र में सफलता मिलेगीसफलता हर एक साधक को हर एक क्षेत्र में मिल ही सकती है जब की साधक की तरफ से उसके ज्ञान प्रदाता की तरफ पूर्ण रूप से समर्पण भाव हो इसके अलावा ज्ञानप्रदाता अर्थात गुरु भी उस ज्ञान पर अपना आधिपत्य रखता होअगर गुरु के पास ज्ञान है तो उसका कर्तव्य है की वह उस ज्ञान को अपने समर्पित शिष्यों को देऔर शिष्यों का भी यह कर्तव्य है की वह गुरु की शरण में पूर्ण रूप से समर्पित भाव से ही रहेदिव्यदेहधारी सिद्ध की बाते सुन कर कुछ कोंध सा गया मेरे दिमाग में, लगा जेसे कुछ याद आ रहा है.लेकिन मेने अपने विचारों को सिद्ध की बातो पर ही केंद्रित करना उच्चित समजा.सरे विचारों को मन से हटा कर वापस से सिद्ध की बातो की तरफ गौर करने लगा.सिद्ध ने अपनी बात को आगे बढ़ाया की कई बार सिद्धगुरु जन्म नक्षत्रो के योग से यह सुनिश्चित करते है की साधक का पूर्व जीवन किस प्रकार की साधनाओ में व्यतीत हुआ है और उसे किस क्षेत्र की तरफ आगे जाना चाहिए क्यों की पूर्व स्मृति से अधिक से अधिक चेतना को प्राप्त किया जा सकेइसके अलावा सिद्धगुरु अपने शिष्य के पूर्व जीवन को देख कर भी यह निर्णय ले सकता हैइससे भी आगे अगर एक सद्गुरु चाहे तो वह अपने शिष्य को किसी भी क्षेत्र में निपुण बना ही सकता है और एक से अधिक क्षेत्र में भी निपुणता दे सकता हैवस्तुतः साधक के लिए यह प्रश्न है ही नहींयह प्रश्न गुरु के ऊपर है की साधक को किस क्षेत्र में कितनी सफलता वह दिला सकेइस लिए साधको के हित में यही रहता है की वह जो भी साधना में रूचि हो करता रहे इस लिए नहीं की वह पर मार्गदर्शन नहीं है वरन इस लिए की वह रास्ता उसके अंतरमन के द्वारा निर्धारित हैसाधक को उक्त समय पर निश्चित रूप से मार्गदर्शन की प्राप्ति हो ही जाती है लेकिन एक निश्चित काल तक उसको अपना मार्जन करने के लिए इस प्रकार से साधना करते रहना चाहिएमेने कहा क्या इसका अर्थ ये है की साधक को गुरु के सामने अपने कार्यक्षेत्र का चुनाव करने की ज़रूरत नहीं हैसिद्ध ने कहा की जब साधक ने अपने आप को गुरु के चरणों में समर्पित कर ही दिया है तब वहाँ पर चुनाव की बात ही कहा पर हैसाधक एक खाली बर्तन होता है और यह गुरु के ऊपर होता है की वह उसमे क्या और केसे भरेसिद्ध की बात सुन कर वापस से ऐसा लगा जेसे कुछ याद आ रहा है लेकिन समज नहीं पायामेने पूछा की इसका अर्थ तो यह है की साधक को साधना करते रहना है और उक्त समय पर गुरु का मार्गदर्शन उसे मिल ही जाता है लेकिन अगर गुरु की प्राप्ति नहीं हुई तो?महासिद्ध ने कहा की साधक को साधना पथ पर जिस प्रकार से गतिशीलता में मदद मिलती है उस प्रकार से इस उसे तब तक किस तरह से और केसे साधना करनी है उस निर्णय में उसकी सहायता स्वः लोक के सिद्ध भी करते हैइस लिए साधक के लिए चिंता का विषय है ही नहींसाधक को सिर्फ इतना करना है की वह साधना करे और पूर्ण समर्पण भाव से युक्त हो कर करे और करता रहेबाकी इसकी पूरी गतिशीलता के ऊपर कई सिद्धमंडल तथा स्वः लोक के सिद्धो का होता ही हैलेकिन जो इससे भी उच्चतम सिद्धसदगुरु होते है वह पहले से ही निर्धारण कर के रखते है की उनके शिष्य किस प्रकार से क्या करेंगे और प्रकृति एसी सिद्धो के विचारों को अपनी आज्ञा मान कर उसका पालन करने के लिए तत्पर होती हैइस लिए साधक का हर एक साधनात्मक पल इसे महा सिद्धो से पूर्वनिर्धारित होता हैमेने कहा की इसे गुरु की प्राप्ति केसे संभव है और किस प्रकार सेउन्होंने कहा की इसे गुरु की प्राप्ति सिर्फ तभी हो सकती है जब व्यक्ति पूर्ण रूप से अपना समर्पण भाव सामने रखे और पूर्ण प्रेममय रहेइसे महा सिद्धो का दर्शन करना भी जीवन में उच्चतम साधनात्मक सौभाग्य ही है लेकिन तंत्रग्रंथो में विवरण है की अगर साधक स्वः लोक से सबंधित सिद्धो से दीक्षा प्राप्त करना चाहे तो गुरुकृपाप्राप्ति मन्त्र गुं गुरुभ्यो नमः का शत लक्ष (एक करोडजाप करना करना पड़ता हैमें मन ही मन तुरंत ही ये सोचमे पड़ गया की सदगुरुदेव की करुणा कितनी है हम लोगो परकी वह हमें इतने प्रेम से दीक्षा दे कर हमारा सारा भार अपने कंधो पर ले लेते हैजब की उसके लिए जो विधान है वह हम कभी जिंदगी भर भी ना कर पाए.उम्र बीत जाती है सिर्फ इसी आस में की एक दिन किसी सिद्ध की कृपा प्राप्त होगी लेकिन सदगुरुदेव ने प्रेमपूर्ण हमें जो दिया सायद उस अमूल्य का हमारी द्रष्टि में कोई मोल ही नहीं हैकितने प्रेम माय हो कर वह हीरक खंड लुटा रहे थे और हम बस देखते ही रहेमन भर आया एक क्षण खुद के लिए ही क्षोभ से.आज इस ज्ञान को प्राप्त कर मन ही मन प्रणाम कर लिया मेने उस प्रकाशपुंज को जिसने मुझे वापस एक बार यह ज्ञान दिया था की सदगुरुदेव हमें कितना प्रेम करते हैहाँ एक बात बताना चाहूँगाऐसे महासिद्ध जो स्वःलोक से भी कई गुना ऊपर हो वह अपने मूल रूप में कभी कभी ही दर्शन देते है क्यों की उनके तेज को सहन नहीं किया जा सकता और उस समय जो शक्ति संचार होता है वह इतना अधिक होता है की साधक अपना आपा खो बेठेइस लिए ज्यादातर वह एक प्रकाशपुंज के रूप में ही दर्शन देते हैमुझे जो सिद्ध अभी ज्ञान प्रदान कर रहे थे वह भी ऐसे ही एक सिद्ध थेमेने मन ही मन वापस एक बार उस हलकी सी स्वर्ण चमक लिए हुए शुभ्र प्रकाश पुंज को प्रणाम किया.

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 प्रकाशपुंज स्वरुप दिव्य महासिद्ध से आगे मेरा प्रश्न यह था की एक शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण किस प्रकार से बढ़ता है जिसके उत्तर में मुझे महासिद्ध ने कहा की शिष्य जब समर्पित होने लगता है तब उसका अनंत मन बाह्य रूप से नयी चेतना को स्वीकार करने में सक्षम हो जाता है और जब ऐसा होता है तो गुरु अपनी प्राणचेतना को उसकी चेतना से जोड सकते है और यह क्रिया के माध्यम से साधक अपने आप को सीधे ही सिद्ध गुरु से जोड़ लेता है, वस्तुतः एक स्थिति एसी आती है जब उसे अपने अंदर तथा बाह्य रूप में सभी जगह पर अपने सिद्धगुरु ही द्रस्तिगोचर होते हैएसी स्थिति आने पर साधक में वह ज्ञान अपने आप ही विक्सित होने लगता है जो वो प्राप्त करना चाहता हैअपने गुरु की ज्ञान चेतना के साथ वह सीधे ही जुड जाता है इस लिए वह सर्व तथ्यों में ज्ञान सार को प्राप्त कर ही लेता हैयह शिष्यता के जीवन की एक अमूल्य उपलब्धि होती हैसाधक को इसके लिए सदैव प्रयत्नशील रहना पड़ता हैसाधक अपने समर्पण भाव को विकसित करने के लिए उनके सद्गुरु के द्वारा प्रदत तत्पुरुष मंत्र का विधि विधान के साथ जाप करेइस प्रकार के मंत्रो की रचना सिद्धगुरु स्वयं ही अपनी प्राणऊर्जा से करते हैजो की सिर्फ उन की प्राण ऊर्जा से सबंधित रहता हैऐसा मंत्र निश्चित रूप से हर एक साधक को सिद्धि के द्वार पर ले कर जा सकता है क्यों की सिद्धगुरु अपनी ही चेतना और प्राण के माध्यम से साधक को मनोभिलाषित सिद्धि प्रदान कर सकते हैऔर इसके लिए जो समर्पण भाव की आपूर्ति होती है उसमे यह मंत्र पूरक बन जाता है.इसके साथ ही साथ साधक को गुरु प्रदत प्राणश्चेतना मंत्र का जाप करते रहना चाहिए (तंत्र कौमुदी अष्टम अंकनिखिलतत्व सायुज्ज श्रीसाधना महाविशेषांक नंबर ६६) जिसके माध्यम से साधक के तथा गुरु के प्राण तथा चेतना जुड सके तथा साधक शीघ्र से अपने लक्ष्य की प्राप्ति को सुनिश्चित कर लेसाधना सफलता के ये मूल तथ्य है क्यों की जब गुरु को अपने ह्रदय में स्थान दे कर उनसे जुड़ाव सुनिश्चित कर लिया गया है तो फिर साधना तथा सिद्धि मिलना किसी भी प्रकार से दुस्कर नहीं हैजब एसी स्थिति आती है तब साधक के आतंरिक ब्रम्हांड का जुड़ाव बाह्यब्रम्हांड से हो जाता हैवस्तुतः बाह्य ब्रम्हांड अनंत है ठीक उसी प्रकार आतंरिक ब्रम्हांड भी अनंत हैलेकिन आतंरिक ब्रम्हांड का आधार मन हैक्यों की मन हमारे अंदर का ऐसा स्थल है जो की अनंत हैइसी लिए इसी धरातल पर आतंरिक ब्रम्हांड जुड़ा हुआ हैइस प्रकार जब यह शृंखला पूर्ण होती है तब साधक जिस किसी भी तथ्य का बाह्य रूप में अवलोकन करता है वही उसे आतंरिक रूप से भी द्रष्टिगोचर होते है और जो आतंरिकरूप से  अवलोकन होता है वाही बाह्य रूप से अनुभूत होता हैएसी स्थिति में प्रकृति की नित्य सत्ता ब्रम्ह का अनुभव उसे आतंरिक तथा बाह्य दोनों रूप से होने लगता हैजब ऐसा होता है तब साधक इसी परब्रम्ह का एक अटूट भाग बन जाता है क्यों की जहा आतंरिक रूप से और बाह्य रूप से एक ही तथ्य सास्वत होता है वहाँ पर विच्छेद नहीं हो सकतायही वह स्थिति जो सर्वश्रेष्ठ होती है और यही वह स्थिति हे जिसे अहं ब्रम्हास्मि” कहा गया है जो की हर एक साधक का लक्ष्य होता है, ना सिर्फ उसे समजना बल्कि उसे महेसूस करनामें सोच में पड़ गया की किस प्रकार एक सामान्य साधक प्रकृति नियंत्रण की सत्ता ब्रम्ह’ बन जाता हैयह विस्मय कारक और आश्चर्यजनक तथ्यों को सुन कर मेरे मन से सारे प्रश्न हवा बन कर उड़ गएएक नूतन ही ज्ञान और नूतन ही चेतना की आभास हो रहा थामेने महासिद्ध की तरफ कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए प्रणाम किया तब मुझे महसूस हुआ की मेरे पास कोई और भी हैसर उठा कर देखा एक सन्यासी खड़े थे जो मेरी तरह ही  प्रकाशपुंज को श्रद्धा के साथ नमस्कार कर रहे थेमेरी तरफ देख कर मुस्कुराए वहऔर फिरसे प्रकाशपुंज स्वरुप उन दिव्यमहासिद्ध को प्रणाम करने लगेमेरे मन में कोई प्रश्न नहीं था सायद इसी भाव के कारण वह दिव्य महासिद्ध का प्रकाशपुंज धीरे धीरे छोटा होता गया और मुट्ठी जितना होने के बाद एक क्षण के लिए इतना प्रकाश हुआ की उस रोशनी में कुछ दिखाई ना देअगले ही क्षण उस जगह पर वह प्रकाशपुंज नहीं थेदिव्य महासिद्ध जिन्होंने मुझे इतना ज्ञान प्रदान किया था वे चले गए थे सायद मेरी ही तरह कोई और अबोध भी अपने प्रश्नों के साथ खड़ा होगा इस आस में की उसे उत्तर मिल जाएकितना कीमती होता है सिद्धयोगियो का एक एक क्षणना जाने कितनी ही दिव्य घटनाओं के ये गुप्त प्रेरक होते होंगेसच ही तो हैहर एक क्षण में नविन बोध है नविन ज्ञान हैऔर जीवन की हर एक घटना किसी नूतन ज्ञान को आमंत्रित करने के लिए ही होती हैयही सब सोच रहा था की मेरे पास वाले सन्यासी की तरफ मेरी नज़र पड़ी वो वही पर खड़े थेमेरी तरफ देख कर किंचित व्यंग से मुस्कुराए वहमेने प्रश्न सूचक द्रष्टि से उनकी तरफ देखाउन्होंने हस्ते हुए कहा क्या तुम जानते हो वो महासिद्ध कौन थेनहीं जानताथोड़े खेद के साथ  जवाब दिया मेनेसन्यासी के चहरे पर अभी भी वही रहस्य और व्यंग वाली मुस्कान थीवह मुड़े और चलने लगेजाते जाते उनके शब्द मुझे सुनाई दिए अपने मूल को भी नहीं पहेचान पाए?” और कुछ क्षण में ही वो सन्यासी आँखों से ओज़ल हो गए.  भावविहीन सा हो गया सन्यासी के आखरी शब्द सुन करशुभ्रप्रकाश चारो तरफ बिखरा हुआ थाऔर में अभी भी उसी जगह खडा हुआ थावो दिव्यप्रकाशपुंज महासिद्ध और कोई नहीं सदगुरुदेव ही थे.